भगवान शिव की स्तुति में अनेक स्तोत्र और चालीसाएँ प्रचलित हैं, जिनमें दो शिव चालीसा विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। इनमें “जय गणेश गिरिजा सुवन” से आरम्भ होने वाली शिव चालीसा सर्वाधिक लोकप्रिय है, जबकि गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित “अज अनादि अविगत अलख” (Aj Anadi Avigat Alakh) से प्रारम्भ होने वाली शिव चालीसा भी श्रद्धापूर्वक पढ़ी और गायी जाती है। दोनों चालीसाओं में भगवान शिव के दिव्य स्वरूप, उनकी महिमा तथा भक्तों पर होने वाली कृपा का सुंदर वर्णन मिलता है।
श्री शिव चालीसा: अज अनादि अविगत अलख | Shri Shiv Chalisa Lyrics: Aj Anadi Avigat Alakh Hindi Lyrics
॥ दोहा ॥
अज अनादि अविगत अलख, अकल अतुल अविकार।
बंदौं शिव-पद-युग-कमल अमल अतीव उदार॥१॥
आर्तिहरण सुखकरण शुभ भक्ति-मुक्ति-दातार।
करौ अनुग्रह दीन लखि अपनो विरद विचार॥२॥
परॺो पतित भवकूप महँ सहज नरक आगार।
सहज सुहृद पावन-पतित, सहजहि लेहु उबार॥३॥
पलक-पलक आशा भरॺो, रह्यो सुबाट निहार।
ढरौ तुरंत स्वभाववश, नेक न करौ अबार॥४॥
॥ चौपाई ॥
जय शिव शंकर औढरदानी।
जय गिरितनया मातु भवानी॥१॥
सर्वोत्तम योगी योगेश्वर।
सर्वलोक-ईश्वर-परमेश्वर ॥२॥
सब उर प्रेरक सर्वनियन्ता।
उपद्रष्टा भर्ता अनुमन्ता॥३॥
पराशक्ति-पति अखिल विश्वपति।
परब्रह्म परधाम परमगति॥४॥
सर्वातीत अनन्य सर्वगत।
निजस्वरूप महिमामें स्थितरत॥५॥
अंगभूति-भूषित श्मशानचर।
भुजंगभूषण चन्द्रमुकुटधर॥६॥
वृषवाहन नंदीगणनायक।
अखिल विश्वके भाग्य-विधायक॥७॥
व्याघ्रचर्म परिधान मनोहर।
रीछचर्म ओढे गिरिजावर॥८॥
कर त्रिशूल डमरूवर राजत।
अभय वरद मुद्रा शुभ साजत॥९॥
तनु कर्पूर-गौर उज्ज्वलतम।
पिंगल जटाजूट सिर उत्तम॥१०॥
भाल त्रिपुण्ड्र मुण्डमालाधर।
गल रुद्राक्ष-माल शोभाकर॥११॥
विधि-हरि-रुद्र त्रिविध वपुधारी।
बने सृजन-पालन-लयकारी॥१२॥
तुम हो नित्य दयाके सागर।
आशुतोष आनन्द-उजागर॥१३॥
अति दयालु भोले भण्डारी।
अग-जग सबके मंगलकारी॥१४॥
सती-पार्वतीके प्राणेश्वर।
स्कन्द-गणेश-जनक शिव सुखकर ॥१५॥
हरि-हर एक रूप गुणशीला।
करत स्वामि-सेवककी लीला॥१६॥
रहते दोउ पूजत पुजवावत।
पूजा-पद्धति सबन्हि सिखावत॥१७॥
मारुति बन हरि-सेवा कीन्ही।
रामेश्वर बन सेवा लीन्ही॥१८॥
जग-हित घोर हलाहल पीकर।
बने सदाशिव नीलकंठ वर॥१९॥
असुरासुर शुचि वरद शुभंकर।
असुरनिहन्ता प्रभु प्रलयंकर॥२०॥
‘नम: शिवाय’ मन्त्र पंचाक्षर।
जपत मिटत सब क्लेश भयंकर॥२१॥
जो नर-नारि रटत शिव-शिव नित।
तिनको शिव अति करत परमहित॥२२॥
श्रीकृष्ण तप कीन्हों भारी।
ह्वै प्रसन्न वर दियो पुरारी॥२३॥
अर्जुन संग लड़े किरात बन।
दियो पाशुपत-अस्त्र मुदित मन॥२४॥
भक्तनके सब कष्ट निवारे।
दे निज भक्ति सबन्हि उद्धारे॥२५॥
शंखचूड़ जालन्धर मारे।
दैत्य असंख्य प्राण हर तारे॥२६॥
अन्धकको गणपति पद दीन्हों।
शुक्र शुक्रपथ बाहर कीन्हों॥२७॥
तेहि सजीवनि विद्या दीन्हीं।
बाणासुर गणपति-गति कीन्हीं॥२८॥
अष्टमूर्ति पंचानन चिन्मय।
द्वादश ज्योतिर्लिंग ज्योतिर्मय॥२९॥
भुवन चतुर्दश व्यापक रूपा।
अकथ अचिन्त्य असीम अनूपा॥३०॥
काशी मरत जंतु अवलोकी।
देत मुक्ति-पद करत अशोकी॥३१॥
भक्त भगीरथकी रुचि राखी।
जटा बसी गंगा सुर साखी॥३२॥
रुरु अगस्त्य उपमन्यू ज्ञानी।
ऋषि दधीचि आदिक विज्ञानी॥३३॥
शिवरहस्य शिवज्ञान प्रचारक।
शिवहिं परम प्रिय लोकोद्धारक॥३४॥
इनके शुभ सुमिरनतें शंकर।
देत मुदित ह्वै अति दुर्लभ वर॥३५॥
अति उदार करुणावरुणालय।
हरण दैन्य-दारिद्रॺ-दु:ख-भय॥३६॥
तुम्हरो भजन परम हितकारी।
विप्र शूद्र सब ही अधिकारी॥३७॥
बालक वृद्ध नारि-नर ध्यावहिं।
ते अलभ्य शिवपदको पावहिं॥३८॥
भेदशून्य तुम सबके स्वामी।
सहज सुहृद सेवक अनुगामी॥३९॥
जो जन शरण तुम्हारी आवत।
सकल दुरित तत्काल नशावत॥४०॥
॥ दोहा ॥
वहन करौ तुम शीलवश, निज जनकौ सब भार।
गनौ न अघ, अघ-जाति कछु, सब विधि करौ सँभार॥१॥
तुम्हरो शील स्वभाव लखि, जो न शरण तव होय।
तेहि सम कुटिल कुबुद्धि जन, नहिं कुभाग्य जन कोय॥२॥
दीन-हीन अति मलिन मति, मैं अघ-ओघ अपार।
कृपा-अनल प्रगटौ तुरत, करौ पाप सब छार॥३॥
कृपा-सुधा बरसाय पुनि, शीतल करो पवित्र।
राखौ पदकमलनि सदा, हे कुपात्रके मित्र!॥४॥
