यह लेख पूज्य पंडित श्री द्विवेदी (धर्म संघ वाले) जी के जीवन की सत्य घटना पर है। यह उनके लिए भी है, जो यह कहते हैं कि हिंदू धर्म की पूजा या अनुष्ठान ‘ध्यान’ से ज्यादा कुछ नहीं है। पंडित जी के लिये धर्मसम्राट श्री करपात्री महाराज कहा करते थे, यदि विशुद्ध ब्राह्मण का दर्शन करना है तो द्विवेदी जी का करो।

अनुष्ठान से द्विवेदी जी ने बिन्नी को नेत्र ज्योति दी
पूज्य पंडित श्री द्विवेदी जी काशी के महान व्याकरण पंडित श्री महाशय जी के छात्र थे। महाशय जी के दो संताने थी। एक पुत्र जिसका नाम दंडा शास्त्री था। एक बिटिया थी जिसे प्रेम से बिन्नी कहकर बुलाते थे।
अकस्मात बिन्नी की नेत्र ज्योति चली गई। उसे दिन या रात का भी भान नहीं होता था। उसकी आंखों के सामने एकदम अंधकार हो गया। वैद्यों ने हाथ खड़े कर दिये कि अब कुछ नहीं हो सकता।
उस समय अंग्रेजी शासन था। महाशय जी का मन नहीं था कि किसी अंग्रेजी डॉक्टर को दिखाएं। लेकिन फिर भी बिन्नी को एक जर्मनी के डॉक्टर को दिखाया।
उसने परीक्षण किये और बोला अब जीवन में कभी इसको दृष्टि नहीं आ सकती। हां, इसे पीड़ा न हो इसकी औषधि दी जा सकती है। लेकिन यह किसी भी प्रकार से ठीक नहीं होगी। सभी निराश होकर चले आये।
घर पर महाशय जी की ग्रहणी रोने लगीं। यह बिटिया है, कन्या नेत्रहीन है, अब इसका क्या होगा? महाशय जी बोले, नेत्र के अधिष्ठात्र देवता भगवान सूर्य हैं। यदि कोई तपस्वी ब्राहमण निष्ठा पूर्वक सूर्य उपासना करे तो इसकी दृष्टि आ जायेगी।
पंडित श्री द्विवेदी जी बोल पड़े, गुरु जी हम त्रिकाल संध्या करते हैं। रोजाना एक हजार गायत्री जपते हैं। बिन्नी हमारी बहन (गुरु पुत्री) है। हम अनुष्ठान करेंगे, आप बताइए।
पंडित श्री महाशय जी ने 41 दिन का अनुष्ठान बताया जो बड़ा कठिन था। अनुष्ठान में त्रिकाल (सुबह, मध्याह्न और सायंकाल) खुले आकाश के नीचे गाय के गोबर से लीप करके सूर्य यंत्र बनाकर सूर्य पूजन करना था। सूर्य का दर्शन करके आदित्य हृदय और चाक्षुषी विद्या के त्रिकाल कई पाठ करने थे।
पंडित श्री द्विवेदी जी का 21 वें दिन का सुबह का पाठ पूरा हुआ। उस समय बिन्नी खटिया कर बैठी थी। वह बोली, भैया तुम्हारा पाठ बहुत अच्छा लग रहा था, लगता है सूर्योदय हो गया।
पंडित जी बोले बहन, क्या तुम्हें दिख रहा है? बिन्नी ने कहा, हां। बताओ मैं कौन हूँ? द्विवेदी भैया। यह कौन-सा हाथ है? दाहिना। पंडित जी ने पहली उंगली दिखाकर पूंछा, यह कौनसी उंगली है। तर्जनी। फिर उन्होंने आखिरी उंगली दिखाई और पूछा, वह बोली कनिष्ठिका। और जब अंगूठा दिखाया, तो बिन्नी हंस कर बोली, भैया अंगूठा मत दिखाओ।
द्विवेदी जी बोले, अरे! इसे तो बढ़िया दिखने लगा। उन्होंने यह बात अपने गुरुदेव, पूज्य श्री महाशय महाराज जी को बताई। वे बोले, महाराज श्री अभी 41 दिन भी पूरे नहीं हुए। बिन्नी को तो अभी से (21 वें दिन) सब कुछ बढ़िया दिख रहा है।
गुरुदेव श्री महाशय जी ने कहा, देखो अभी इस बात का किसी के सामने प्रकाश मत करना। पहले अनुष्ठान पूरा करो। जब 41 दिन हो गये और अनुष्ठान पूर्ण हो गया। तब गुरुदेव ने कहा, जाओ पंडित जी बिन्नी को जर्मन डॉक्टर को दिखा के आओ।
द्विवेदी जी बिन्नी को जर्मन डॉक्टर के पास ले गये। वह देखते ही चिढ़ गया, बोला, मैंने पहले ही कहा था इसकी आंख में ज्योति नहीं आएगी। इसकी आंख बेकार हो गयी है।
पंडित जी ने कहा, आप पढ़वाकर देख लीजिए। ये तो सब पढ़ती-समझती है।
उसको बड़ा आश्चर्य हुआ, जिसकी नेत्र ज्योति सर्वथा समाप्त हो चुकी हो। विज्ञान के अनुसार ज्योति आने की कोई संभावना न बची हो फिर नेत्र ज्योति वापस आ जाना, यह तो बहुत विलक्षण घटना है।
डॉक्टर ने पूंछा, क्या दवाई खाई, कौन-सा इलाज किया? पंडित जी ने बताया, न कोई दवाई खाई और न ही इलाज किया। हमारे गुरुजी ने अनुष्ठान बताया था। उसीसे असम्भव सम्भव हो गया।
तब उसको समझ आया कि भारतीय मंत्रो की उपासना में कितनी शक्ति होती है। वह बोला, हमको गुरुजी का दर्शन हो सकता है? पंडित जी ने कहा ये तो उनसे पूछना होगा।
पंडित जी आये और महाशय गुरुदेव से पूछा डॉक्टर आपके दर्शन करना चाहते हैं। महाशय जी म्लेच्छ से संभाषण नहीं करते थे। शास्त्र की दृष्टि में वह म्लेच्छ हुआ। गुरुदेव बोले उससे कहना, बातचीत नहीं होगी। हम नदी से इतने बजे स्नान करके आते हैं, अमुक जगह खड़े होकर दूर से प्रणाम कर ले।
पंडित श्री द्विवेदी और दंडा शास्त्री डॉक्टर के पास गये और डॉक्टर को समय बता दिया। उन्होंने देखा, अंग्रेजी शासन में वह जर्मन का बड़ा डॉक्टर आया, उसने अपने जूते खोले, हेड उतारा और धरती पर लेट कर दूर से गुरु जी को साष्टांग किया और चला गया।
इस कहानी को बताने का आशय यह है कि यदि आज भी ब्राह्मण सविधि शिखा-सूत्र धारी, त्रिकाल संध्योपासक और शास्त्रोक्त कर्म करने वाला हो तो उसके द्वारा किया गया कोई भी अनुष्ठान या पूजा पूर्ण फल देने वाली होगी।
