हनुमान चालीसा का अर्थ हिंदी में (Hanuman Chalisa Meaning in Hindi) समझ लेने से पाठ आपके लिये ज्यादा प्रभावी हो जायेगा। क्या आप जानते हैं? शास्त्रों में विदित पाठ (चालीसा, स्तोत्र, कवच, आदि) करते समय 6 ऐसे दोष हैं जिन्हें करने से अल्प फल की प्राप्ति होती है।
श्री हनुमान चालीसा हिंदी अर्थ सहित
6 में से एक दोष या गलती है, अर्थ समझे बिना पाठ करना। इस दोष को हटाने के लिए आपको अर्थ के साथ पाठ तब तक करना चाहिए जब तक आप दोहा या चौपाई पढ़ते समय उसका अर्थ सोच न सकें।
दोहा
श्री गुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि । बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि ॥
अर्थ: श्री गुरुदेव के चरणों की धूल से अपने मन का दर्पण सुधारकर, मैं श्रीराम के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो चारों प्रकार के फलों (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) को देने वाले हैं।
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार । बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार ॥
अर्थ: मैं अपने आप को बुद्धिहीन जानकर पवनपुत्र हनुमान का स्मरण करता हूँ। हे हनुमान! मुझे बल, बुद्धि और विद्या (ज्ञान) प्रदान करो और मेरे दुःख-दोष हटा दो।
चौपाई
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर । जय कपीस तिहुं लोक उजागर ॥ १ ॥
अर्थ: आपकी जय हो, श्री हनुमान जी! आप ज्ञान और गुणों के सागर हैं। हे कपीश्वर (वानरों के ईश्वर)! आपकी तीनों लोकों में कीर्ति हैं।
रामदूत अतुलित बल धामा । अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा ॥ २ ॥
अर्थ: आप प्रभु राम के दूत और अतुलनीय बल के धाम हैं। आप माता अंजना के पुत्र और पवन के पुत्र कहलाते हैं।
महाबीर बिक्रम बजरंगी । कुमति निवार सुमति के संगी ॥ ३ ॥
अर्थ: आप महान वीर, अनन्त पराक्रमी और बजरंगी (वज्र-सदृश शरीर) हैं। आप कुबुद्धि (बुरी सोच) को नष्ट करने वाले और सद्बुद्धि (अच्छी बुद्धि) वाले के मित्र हैं।
कंचन बरन बिराज सुबेसा । कानन कुंडल कुंचित केसा ॥ ४ ॥
अर्थ: आपकी स्वर्ण के समान देह पर सुन्दर वस्त्र सुशोभित हैं। आप कानों में कुंडल पहनते हैं और आपके घुंघराले बाल हैं।
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै । कांधे मूंज जनेऊ साजै ॥ ५ ॥
अर्थ: आपके हाथ में वज्र के समान गदा और ध्वज विराजमान है। आपके कंधे पर मूँज का जनेऊ है।
संकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग बन्दन ॥ ६ ॥
अर्थ: आप भगवान शंकर के अवतार और केसरी के पुत्र हो। आपकी महिमा और पराक्रम की पूरे ब्रह्मांड में वन्दना होती है।
विद्यावान गुनी अति चातुर । राम काज करिबे को आतुर ॥ ७ ॥
अर्थ: आप विद्वान, गुणी और अत्यंत कुशल व बुद्धिमान हैं। आप प्रभु श्री राम के कार्य करने को तत्पर रहते हैं।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया । राम लखन सीता मन बसिया ॥ ८ ॥
अर्थ: आप प्रभु के चरित्र को सुनने में आनंद रस लेते हैं। आपके हृदय में राम-लक्ष्मण-सीता का वास है।
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा । बिकट रूप धरि लंक जरावा ॥ ९ ॥
अर्थ: आपने बहुत छोटा रूप धारण कर सीता जी को दिखाया। फिर भयंकर रूप धारण कर लंका जलाई।
भीम रूप धरि असुर संहारे । रामचंद्र के काज संवारे ॥ १० ॥
अर्थ: आपने विकराल रूप लेकर राक्षसों का संहार किया और रामचंद्र के कार्य सफल किए।
लाय सजीवन लखन जियाये । श्रीरघुबीर हरषि उर लाये ॥ ११ ॥
अर्थ: आपने संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण की जान बचाई। इससे श्री राम ने हर्षित होकर आपको हृदय से लगा लिया।
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई । तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ॥ १२ ॥
अर्थ: श्री राम जी ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा, तुम मुझको भरत के समान ही प्रिय हो।
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं । अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं ॥ १३ ॥
अर्थ: हजार सिर वाले शेषनाग आपकी महिमा गाते हैं! ऐसा कहते हुए लक्ष्मी पति भगवान श्रीराम ने आपको हृदय से लगा लिया।
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा । नारद सारद सहित अहीसा ॥ १४ ॥
अर्थ: सनकादि (सनक, सनातन, सनन्दन, सनत्कुमार) ऋषि, ब्रह्मा आदि देवगण तथा मुनि नारद, माता सरस्वती के साथ भगवान शेषनाग;
जम कुबेर दिगपाल जहां ते । कबि कोबिद कहि सके कहां ते ॥ १५ ॥
अर्थ: यमराज (मृत्यु के देवता), कुबेर (धन के देवता) और दिग्पालक (10 दिशाओं के देवता) भी आपकी महिमा का वर्णन नहीं कर पाए हैं। फिर कवि, कोविद (वेदों के ज्ञानी, वेदज्ञ) और विद्वान् आपका पार कहाँ पा सकते हैं।
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा । राम मिलाय राज पद दीन्हा ॥ १६ ॥
अर्थ: आपने सुग्रीव को प्रभु श्री राम जी से मिलवाकर बड़ा उपकार किया और उन्हें राजा का पद दिलवाया।
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना । लंकेस्वर भए सब जग जाना ॥ १७ ॥
अर्थ: इसी प्रकार, आपके उपदेशों का विभीषण ने भी पालन किया जिससे वे लंका का राजा हुए। यह पूरा संसार जानता है।
जुग सहस्र जोजन पर भानू । लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥ १८ ॥
अर्थ: आपने सूर्यदेव को मीठा फल समझकर निगल लिया जो हजार युग योजन दूरी पर हैं।
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं । जलधि लांघि गये अचरज नाहीं ॥ १९ ॥
अर्थ: यह कोई आश्चर्य की बात नहीं जो आपने प्रभु श्रीराम की अंगूठी को अपने मुख में रखकर 100 योजन का समुद्र लांघ लिया।
दुर्गम काज जगत के जेते । सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ॥ २० ॥
अर्थ: आपकी कृपा से संसार के सभी कठिन कार्य सरल हो जाते हैं।
राम दुआरे तुम रखवारे । होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥ २१ ॥
अर्थ: आप राम के द्वारपाल हैं। आपके आदेश के बिना कोई अंदर नहीं जा सकता, अर्थात भगवान राम के दर्शन आपके आशीर्वाद से ही संभव हैं।
सब सुख लहै तुम्हारी सरना । तुम रक्षक काहू को डर ना ॥ २२ ॥
अर्थ: वह सब सुख पाता है जो आपकी शरण में है। जिसके आप रक्षक हैं उसे किसी का डर नहीं होता।
आपन तेज सम्हारो आपै । तीनों लोक हांक तें कांपै ॥ २३ ॥
अर्थ: आप ही अपने बल को स्वयं नियंत्रित कर सकते हैं। आपकी एक हुंकार से तीनों लोक कांप उठते हैं।
भूत पिसाच निकट नहिं आवै । महाबीर जब नाम सुनावै ॥ २४ ॥
अर्थ: जब कोई महावीर हनुमान का नाम लेता है तो भूत-प्रेत उसके निकट भी नहीं आते।
नासै रोग हरै सब पीरा । जपत निरंतर हनुमत बीरा॥ २५॥
अर्थ: हनुमान वीर का नाम निरंतर जप करने से रोग नष्ट होते हैं और सारी पीड़ा मिट जाती है।
संकट तें हनुमान छुड़ावै । मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥ २६ ॥
अर्थ: हनुमान उसे हर संकट से छुड़ा लेते हैं जो मन, कर्म, वचन तथा ध्यान से (सच्चे मन से) उनका स्मरण करता है।
सब पर राम तपस्वी राजा । तिन के काज सकल तुम साजा ॥ २७ ॥
अर्थ: तपस्वी राजा श्री राम ही सर्वश्रेष्ठ हैं। उनके भी सभी कार्यों को तुमने सहज में ही कर दिया।
और मनोरथ जो कोई लावै । सोइ अमित जीवन फल पावै ॥ २८ ॥
अर्थ: यदि कोई भी अपनी इच्छा तुमसे मांगता है तो वह अपने जीवन में असीम (जिसकी कोई सीमा नहीं) फल पाता है।
चारों जुग परताप तुम्हारा । है परसिद्ध जगत उजियारा ॥ २९ ॥
अर्थ: यह सम्पूर्ण विश्व में विख्यात है कि आपकी महिमा चारों युगों (सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, कलियुग) में है।
साधु-संत के तुम रखवारे । असुर निकंदन राम दुलारे ॥ ३० ॥
अर्थ: आप साधु-संतों के रक्षक, राक्षसों का नाश करने वाले और श्री राम के प्रिय हैं।
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता ॥ ३१ ॥
अर्थ: आपको सीता माता ने आठ सिद्धियाँ और नौ निधियां किसी को भी दने का वरदान दिया।
राम रसायन तुम्हरे पासा । सदा रहो रघुपति के दासा ॥ ३२ ॥
अर्थ: आपके पास रामभक्ति का अमृत है। आप सदा श्री राम के सेवक बने रहो।
तुम्हरे भजन राम को पावै । जनम-जनम के दुख बिसरावै ॥ ३३ ॥
अर्थ: जो आपका (हनुमान का) भजन/स्मरण करतें है, वे राम की प्राप्ति करते हैं और जन्म-जन्मांतर के सारे दुःख भूल जाते है।
अन्तकाल रघुबर पुर जाई । जहां जन्म हरि-भक्त कहाई ॥ ३४ ॥
अर्थ: और वे मृत्यु के बाद राम के धाम (साकेत) को जाते हैं। और यदि कहीं जन्म भी लेंगे तो राम के भक्त कहलायेंगे।
और देवता चित्त न धरई । हनुमत सेइ सर्ब सुख करई ॥ ३५ ॥
अर्थ: किसी अन्य देवता को पूजे बिना, केवल श्री हनुमान जी को पूजने मात्र से ही सभी सुख प्राप्त हो जाते हैं।
संकट कटै मिटै सब पीरा । जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥ ३६ ॥
अर्थ: उसके सभी संकट और पीड़ाएँ मिट जाती हैं जो हनुमान बल के वीर का स्मरण करता है।
जै जै जै हनुमान गोसाईं । कृपा करहु गुरुदेव की नाईं ॥ ३७ ॥
अर्थ: आपकी जय हो, जय हो, जय हो! श्री हनुमान जी! आप गुरु की तरह हम पर कृपा कीजिये।
जो सत बार पाठ कर कोई । छूटहि बंदि महा सुख होई ॥ ३८ ॥
अर्थ: जो कोई हनुमान चालीसा सौ बार पढ़ता है, उसके बंधन छूट जाते हैं और उसे महान सुख प्राप्त होता है।
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा । होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥ ३९ ॥
अर्थ: जो कोई यह हनुमान चालीसा पढ़ता है, उसे सिद्धि प्राप्त होती है। भगवान शिव इसके साक्षी हैं।
तुलसीदास सदा हरि चेरा । कीजै नाथ हृदय मंह डेरा ॥ ४० ॥
अर्थ: तुलसीदास हमेशा श्री राम के सेवक रहें। हे नाथ! आप मेरे हृदय में निवास करें।
दोहा
पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप । राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप ॥
अर्थ (दोहे का): हे पवन के पुत्र, आप संकट हरने वाले और मंगल के रूप हो। हे देवताओं के स्वामी! आप राम-लक्ष्मण-सीता के साथ हमारे हृदय में निवास करें।
हनुमान चालीसा से सम्बंधित
- हनुमान चालीसा पाठ के लाभ
- हनुमान चालीसा रचना कैसे हुई?
- हनुमान चालीसा पाठ की विधि
अन्य चालीसा अर्थ सहित
- गणेश चालीसा अर्थ
- शिव चालीसा अर्थ
- दुर्गा चालीसा अर्थ
- राम चालीसा अर्थ
- कृष्ण चालीसा अर्थ
