हनुमान जी कितने बलशाली हैं इसका ठीक-ठीक अंदाजा लगाना असंभव है। बस इसका अनुमान ही लगाया जा सकता है। उनके लिये कुछ करना असंभव नहीं है क्योंकि वे भगवान हैं। आज तक कोई भी उनके बल का पूरा वर्णन नहीं कर पाया है। जिससे जितना बन पड़ा उसने उतना ही कह दिया।
हनुमान जी कितने बलशाली हैं?
हनुमान जी भगवान हैं इसीलिये उनके बल की कोई सीमा नहीं है। तुलसीदास ने उनके बल का वर्णन करते हुए हनुमान चालीसा में लिखा है, ‘तीनहुँ लोक हांक ते कांपै।’ अर्थात – आप इतने बलशाली हैं कि आपकी दहाड़ से तीनों लोक काँप जाते हैं। हनुमान जी के बल का थोड़ा बहुत वर्णन पुराणों और वाल्मिकी रामायण में भी है। जिसे उनकी प्रेरणा से मैंने नीचे लिखा है।
शास्त्रों में हनुमान जी के बल की माप
एक हाथी बराबर बल वाले को गज कहते हैं। 1000 हाथियों के बली को दिग्गज कहते हैं। 10,000 दिग्गजों वाले को महागज कहते हैं। 10,000 महागज के बराबर बल हो, उसे ऐरावत कहते हैं। 10,000 ऐरावत के समान जिसमें बल हो, वह देवराज इन्द्र होता है। 10,000 इन्द्र के बराबर बल हनुमान जी के एक रोम में है।
वाल्मिकी रामायण के सुन्दरकाण्ड में हनुमान जी की शक्ति का वर्णन
हनुमान जी की शक्ति का वर्णन वाल्मिकी रामायण के सुन्दरकाण्ड में आता है। लंका में सीता माता को दुखी देख हनुमान जी अत्यंत दुखी होते हैं। वे माता से कहते हैं, हे देवी! मेरी पीठ पर बैठ जाओ मैं तुम्हें अगले ही क्षण श्रीराम जी से मिला दूंगा।
सीता जी ने तर्क दिया, राक्षसों को पता चल जायेगा जब तुम हमको पीठ पर ले चलोगे। वे अस्त्र-शस्त्रों से प्रहार करेंगे। मैं क्षत-विक्षत हो कर नीचे गिर जाऊँगी। तुम्हारा उद्यम व्यर्थ हो जायेगा। तुम अकेले राक्षसों से कैसे लड़ोगे?
हनुमान जी हंसकर बोले, राक्षसों की चिंता न करो ‘न रावण सहस्त्रं में युद्धे प्रतिबलं भवेत्।’ हजार रावण एक साथ मिलकर मुकाबला नहीं कर सकते। ये राक्षस किस खेत की मूली हैं। आप इनकी चिन्ता न करें।
जब हनुमान जी ने जानकी जी की बात का उत्तर दे दिया तब उन्होंने दूसरा तर्क दिया। वे बोलीं, तुम जब मुझे लेकर बड़े वेग से उड़ोगे तब मैं भयंकर वायु वेग को कैसे सहूंगी। उस वायु के वेग से मेरे प्राण निकल जायेंगे।
हनुमान जी बोले, माता! हम आपको बहुत सम्भालकर ले चलेंगे। आपको वायु वेग का बिल्कुल अनुभव भी नहीं होगा।
जानकी जी बोलीं, हम ऊपर से समुद्र की ओर देखेंगे। डर से मेरे प्राण निकल जायेंगे। और अगर किसी राक्षस ने आक्रमण किया कहीं मैं तुम्हारी पीठ से कूद गयी तो मैं जलचरों का भोज्य बन जाऊँगी। फिर तुम्हारा उद्यम व्यर्थ हो जायेगा।
हनुमान जी ने कहा, आपके सभी प्रश्रों के समाधान हमारे पास हैं। मैं अकेले राक्षसों के लिये पर्याप्त हूँ, नीचे मैं गिरने नहीं दूंगा, वायु वेग आपको अनुभव नहीं होने दूंगा, रावण भी कुछ कर नहीं पायेगा। अब कोई बाधा नही है। इसलिये हे माता! अब आप हमारे साथ चलिये।
माता बोलीं, अब भी एक बाधा है। मैं पतिव्रता हूँ। पराये पुरुष का मैं अपनी इच्छा से स्पर्श नहीं कर सकती। रावण तो मुझे चुपके से जबरदस्ती ले आया था।
हनुमान जी ने उत्तर दिया, आप मेरी माता हैं और आपने भी मुझे पुत्र स्वीकार कर लिया है। एक सन्यासी जिसके लिये काष्ठ (लकड़ी) से बनी परायी स्त्री को देखना भी निषिद्ध होता है यदि वह भी अपनी माँ को स्पर्श करले तो उसका भी धर्म नष्ट नहीं होता। इसलिये हे माता! आपका भी पतिव्रत धर्म मेरे स्पर्श से नष्ट नहीं होगा।
वे आगे कहते हैं, माता! यदि आप मेरे साथ प्रसन्नता से चलने को तैयार नहीं तो कोई बात नहीं है। आप अपनी निशानी मुझे दीजिये। प्रभु श्रीराम बहुत जल्द आकर, दुष्ट राक्षसों का अंत कर आपको यहाँ से ले जायेंगे।
वाल्मिकी रामायण में लक्ष्मण शक्ति के समय हनुमान जी की शक्ति का वर्णन
उस समय सब शोकग्रस्त हो जाते हैं कि कौन हिमालय से इतने कम समय में संजीवनी लायेगा। तब हनुमान जी कहते हैं, खौलते हुए तेल के कड़ा में सरसों के कुछ दाने डालो। वे परिपक्व नहीं हो पायेंगे उससे पहले कहो कि मेरु मदराचल को उखाड़ कर यहाँ ले आऊँ।
