हिन्दू धर्म में मोक्ष के प्रकार का वर्णन मिलता है। हमारे धर्म के हिसाब से मोक्ष एक तरह का नहीं बल्कि कई तरह का होता है। असल में साधना, भक्ति और ज्ञान के भिन्न-भिन्न मार्गों के अनुसार मोक्ष के अनेक रूप माने गए हैं।
मोक्ष कितने प्रकार के होते हैं?
मोक्ष छह प्रकार के होते हैं।
- सालोक्य मोक्ष
- सार्ष्टि मोक्ष
- सामिप्य मोक्ष
- सारुप्य मोक्ष
- सायुज्य मोक्ष
- कैवल्य मोक्ष
सालोक्य मोक्ष
भगवान के लोक की प्राप्ति को सालोक्य मोक्ष कहा जाता है। इसका अर्थ हुआ, भक्त या साधक को अपने इष्ट के लोक की प्राप्ति हो जाना।
सार्ष्टि मोक्ष
भगवान के समान ऐश्वर्य प्राप्त हो जाना सार्ष्टि मोक्ष कहलाता है। भगवान विष्णु के भक्त ध्रुव को सार्ष्टि मोक्ष की प्राप्ति हुई थी।
उन्होंने भगवान से राजा का ऐश्वर्य माँगा था। इसलिए जब तक वे पृथ्वी पर रहे तब तक चक्रवर्ती राजा रहे और मृत्यु के पश्चात वे अपने ध्रुव लोक में राजा बनकर विराज रहे हैं।
सामिप्य मोक्ष
भगवान के लोक में उनकी समीपता प्राप्त होना सामिप्य मोक्ष है। इस मोक्ष में भक्त को भगवान के समीप रहने को मिलता है। समीप रहने का अर्थ है, भक्त को भगवान के रोज दर्शन होते हैं या उनकी कोई सेवा मिलती है।
सारुप्य मोक्ष
भगवान के जैसा चतुर्भुजी रूप की प्राप्ति को सारुप्य मोक्ष कहा जाता है। इसमें भक्त को भगवान के समान चतुर्भुज रूप मिलता है।
जय-विजय आदि भगवान के पार्षद उनके समीप, उनकी सेवा में उनके ही सामान चतुर्भुजी रूप में रहते हैं। धुंधकारी को प्रेत योनि से मुक्त करने वाले गोकर्ण सशरीर भगवान के जैसा चतुर्भुजी रूप में उनके धाम में गये थे।
सायुज्य मोक्ष
सायुज्य मोक्ष को ही एकत्व मोक्ष कहा जाता है। भगवान से एकाकार, उन्हीं में समाहित हो जाना सायुज्य मोक्ष कहलाता है। इसमें भक्त अपना अस्तित्व मिटाकर भगवान में ही सदा-सदा के लिये समाहित हो जाता है।
कैवल्य मोक्ष
ज्यादातर लोग कैवल्य और सायुज्य मोक्ष में भेद नहीं कर पाते। लेकिन ये दो अलग-अलग प्रकार के मोक्ष हैं।
केवल आत्मा के वास्तविक स्वरूप (ब्रह्मस्वरूप) बनकर शेष रहना कैवल्य मोक्ष कहलाता है। यह भक्ति से नहीं बल्कि तत्व ज्ञान से प्राप्त होता है।
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