पूजा में पाठ करते समय आपको ये 6 गलतियाँ नही करनी चाहिये। वरना आपको पूरा फल नहीं मिलेगा। यह भी संभव है कि आपको उल्टा फल मिले। शास्त्रों में चालीसा, स्तोत्र और अनुष्ठानों आदि पाठों की जो महिमा गाई गयी है, वह अक्षरशः सत्य है। लेकिन यह अत्यंत आवश्यक है कि हम पूरी विधि और नियम के साथ पाठ करें। इसके साथ ही यह भी ध्यान रखें कि क्या निषेध है, उसे कदापि न करें। केवल तभी हमें पूरा फल प्राप्त होगा। यह 6 गलतियाँ पाठ करते समय नहीं करनी चाहिये। इनके करने से अल्प फल की प्राप्ति होती है।

पाठ करते समय 6 गलतियाँ
हमारे शास्त्रों में एक श्लोक “गीति शीघ्री शिरः कम्पी, तथा लिखित पाठकः। अनर्थज्ञोल्प कण्ठश्च, षडे ते पाठकाधमा॥” के अनुसार ये 6 गलतियाँ पाठ में किसी को भी नहीं करनी चाहिए। शास्त्रों में, यह 6 प्रकार के अधम पाठक बतायें गयें हैं। यदि इन क्षह दोषों में से एक भी दोष आपके पाठ में हैं तो आपको पूरा फल नहीं मिलेगा।
- गीति
- शीघ्री
- शिरः कम्पी
- लिखित पाठकः
- अनर्थज्ञ
- अल्प कण्ठ
गीति
किसी भी श्लोक या चौपाई को पढ़ते समय स्वर की असंगति पाठ में दोष उत्पन्न करती है। जब किसी श्लोक या चौपाई को बहुत तेज तो किसी को धीमे स्वर में गायन किया जाता है, तो लय बिगड़ जाती है और मंत्र का प्रभाव कम या विपरीत हो सकता है। इसलिए पाठ की एकरूपता आवश्यक है। एक ही लय, एक समान स्वर और स्पष्ट ध्वनि बनाए रखें। ताल और उच्चारण पर ध्यान दें तथा मन को एकाग्र रखें। अनुशासनपूर्वक, संयमित गति में और समान स्वर में किया गया पाठ शुद्ध फल देता है। यह अनुभवजन्य रूप से सत्य है।
शीघ्री
किसी भी श्लोक या चौपाई का पाठ हड़बड़ी में, जल्दी-जल्दी पढ़कर पाठ नहीं करना चाहिए। यह अनुचित है। मंत्रों की शक्ति उनके शब्दों, लय और मनोभेद में निहित रहती है; तेज़ी से पढ़ने पर उच्चारण अस्पष्ट हो जाता है और अर्थ खो जाता है। इससे पाठ का प्रभाव कमजोर या उल्टा हो सकता है। इसलिए शांति से बैठकर, सही उच्चारण, अर्थ की समझ और भक्ति-एकाग्रता के साथ पढ़ना चाहिए। धीमा, स्पष्ट और मननयुक्त पाठ ही शुद्ध फल देता है; हड़बड़ी में किया गया पाठ सत्कार्य का मार्ग नहीं खोलता। धीरे और अर्थ सहित पढ़ना अधिक प्रभाव देता है।
शिरः कम्पी
शिर या शरीर हिलाते हुए पाठ करना भी एक दोष है। ऐसा करने से शरीर की ऊर्जा स्थिर नहीं होती। जिसकी पूजा-पाठ या किसी भी अनुष्ठान में बहुत आवश्यकता होती है। नियम तो इतना है कि बिल्कुल भी शरीर हिलना नहीं चाहिये। कहीं अगर कोई खुजली भी हो तो उसे सहना चाहिये। ऐसा करने से शरीर की ऊर्जा स्थिर होती है, जो मानसिक एवं आध्यात्मिक स्तर को ऊँचा उठाने में सहायक होती है।
लिखित पाठकः
खुद का लिखा हुआ पाठ नहीं पढ़ना चाहिये। पुराने समय में यह पद्दति इसलिये थी ताकि सभी एक-दूसरे को स्तोत्र दान करें। ऐसा करने से सभी को स्तोत्र दान का फल मिले। क्या आप जानते हैं, स्तोत्र दान की बड़ी महिमा है। गणेश अथर्वशीर्ष आठ ब्राह्मणों को दान करने से व्यक्ति सूर्य के समान तेजस्वी हो जाता है।
अनर्थज्ञ
पाठ करते समय अर्थ का अनुशंधान न करना भी एक दोष है। ऐसा इसलिए क्योंकि अर्थ अनुसंधान बिना पाठ करने से उस भाव की जाग्रति नहीं होगी जिसकी आवश्यकता है। भाव के जागरण के बिना पूरा फल मिल ही नहीं सकता। इसलिए हमें अर्थ समझकर या अर्थ के साथ ही पाठ करना चाहिये ताकि भाव की जाग्रति हो और हमें पूरा फल मिले।
अल्प कण्ठ
इस तरह से पढ़ना कि किसी को समझ में ही न आये, दृष्टि पाठ या मन में पाठ करना भी एक दोष है। यदि आप मन में पाठ करते हैं और कोई बोलता है तो आपका ध्यान पाठ से हट जायेगा। कहीं आप ऐसे पढ़ते हैं कि किसी को समझ में न आये, ऐसा व्यक्ति डर में करता है। ऐसा करने से श्लोकों का गलत प्रभाव आप पर पड़ सकता है। जिससे आपको कम फल या संभवता उल्टा फल मिलेगा।
पाठ में शुद्धता का महत्व
एक छोटे से गाँव में रहने वाले एक पंडित जी की पत्नी गंभीर रूप से बीमार पड़ गई। वे देवी कवच पत्नी के स्वास्थ्य सुधार के लिए करने लगे। उनकी कड़ी मेहनत के बावजूद पत्नी की तबियत में सुधार नहीं हुआ। समय के साथ पंडित जी के हृदय में चिंता और निराशा बढ़ने लगी।
एक रात क्रोध और निराशा में वह देवी से प्रश्न करने लगे। “मैं दिन-रात पाठ करता हूँ, फिर भी मेरी गृहिणी क्यों ठीक नहीं हो रही? तुम क्या कर रही हो भगवती?” उस रात उन्हें देवी का स्पष्ट स्वप्न आया। देवी ने शांत स्वर में कहा — “पंडित जी, तुम दोष मुझ पर थोप रहे हो, पर तुमने खुद ध्यान नहीं दिया।”
देवी ने समझाया कि पाठ में जो वाक्य है, वह ‘भार्यां रक्षतु भैरवी’ — अर्थात् “हे भैरवी! पत्नी की रक्षा करो।” पर पंडित जी तुम बोलते हो ‘भार्यां भक्षतु भैरवी’, जिसका अर्थ बनता है “हे भैरवी! पत्नी का भक्षण करो।” याद रहे, जो शब्द तुम्हारे वचन में आया, वही प्रभाव दिखेगा। देवी ने कहा कि देवताओं को भी आपके शब्दों का पालन करना पड़ता है। यदि पाठ-उच्चारण, भावना या नियमों में त्रुटि हो तो फल विपरीत मिल सकता है।
कहने का तात्पर्य है, कि हम पाठ ठीक कर रहे हैं या नहीं इसका ही हमें ज्ञान नहीं है तो फल हमें ठीक मिल ही नहीं सकता।
