दिल्ली का शाही किला… सैकड़ों सैनिक… और एक कैद में बंद संत। फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि पूरी सल्तनत में अफरा-तफरी मच गई? कहा जाता है कि गोस्वामी तुलसीदास को बचाने वाले बंदर जब दिल्ली के लाल किला में टूट पड़े, तो मुगल सम्राट अकबर की सारी शक्ति बेबस हो गई। आखिर वे कौन थे, और एक संत के लिए उन्होंने ऐसा क्यों किया? क्या यह दैवी संकेत था, भक्ति की शक्ति, या कुछ और…?

जब गोस्वामी तुलसीदास को अकबर ने बुलाया
यह घटना उस काल की है जब मुगल सम्राट अकबर ने संत-शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास को दिल्ली के लाल किला में उपस्थित होने का आदेश दिया। प्रारम्भ में तुलसीदास जी ने दरबार में जाने से विनम्रतापूर्वक इंकार कर दिया, परंतु यह विचार कर कि उनके कारण अकबर काशी में भक्तों को किसी प्रकार का कष्ट न दे इसीलिए वे अंततः दिल्ली के लिए प्रस्थान कर गए।
अकबर के मन में संत के प्रति जिज्ञासा कम और चमत्कार देखने की इच्छा अधिक थी। उसे यह समाचार मिला था कि तुलसीदास जी की प्रार्थना से एक मृत व्यक्ति पुनः जीवित हो उठा था। इसी कारण उसने उन्हें दरबार में बुलाया, ताकि वह स्वयं कोई अद्भुत चमत्कार देख सके।
दरबार में पहुँचने पर अकबर ने आदेशात्मक स्वर में कहा, “कोई चमत्कार दिखाइए।”
तुलसीदास जी ने शांत और दृढ़ स्वर में उत्तर दिया, “मैं कोई चमत्कारी पुरुष नहीं, केवल श्रीराम के चरणों का सेवक हूँ।” सबके सामने अपनी इच्छा अस्वीकार होते देख अकबर क्रोधित हो उठा। उसकी अहंकारपूर्ण प्रवृत्ति को यह अस्वीकार सहन न हुआ और उसने तुलसीदास जी को कारागार में डालने का आदेश दे दिया।
किंवदंती है कि उसी कारागार में तुलसीदास जी ने हनुमान चालीसा की रचना की। कुछ मतों के अनुसार, वे इतने महान राम नाम जापक थे कि हनुमान जी उनके कष्ट को सहन न कर सके। पवनपुत्र हनुमान स्वयं रात्रि में उनके सम्मुख प्रकट हो गए।
हनुमान जी ने स्नेहपूर्वक पूछा, “तुलसीदास, तुम्हारी कुशल तो है?”
तुलसीदास जी ने विनम्र भाव से उत्तर दिया, “प्रभु! आपकी कृपा से सब मंगल है। बाहर प्रसिद्धि के कारण लोग हर समय घेर लेते हैं। यहाँ एकांत है, राम नाम जपने का उत्तम अवसर मिल गया।”
हनुमान जी मुस्कुराए और बोले, “ऐसे नहीं तुलसीदास, इसे चमत्कार दिखाना ही होगा।”
तुलसीदास जी ने हाथ जोड़कर विनम्र भाव से कहा, “प्रभु! हमारे लिए तो आप ही सबसे बड़े चमत्कार हैं। जो आपको उचित लगे, वही कीजिए।”
इतना सुनते ही हनुमान जी की कृपा से हजारों बलशाली वानर प्रकट हो गए। वे विशालकाय बंदर पूरे किले में उत्पात मचाने लगे। बंदरों ने सैनिकों को उठाकर पटक दिया, अस्त-व्यस्तता छा गई। कोई समझ ही नहीं पा रहा था कि यह सब कैसे और क्यों हो रहा है।
जब स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई, तब अकबर ने अपने बुद्धिमान मंत्री बीरबल से कारण पूछा। बीरबल ने संकेत करते हुए कहा, “हुज़ूर, आप ही तो चमत्कार देखना चाहते थे।”
अब सम्राट का अहंकार चूर हो चुका था। भयभीत और लज्जित होकर वह नतमस्तक हुआ और प्रार्थना की, “हे तुलसीदास! हमें क्षमा करें। यह चमत्कार रोक दीजिए। आज के बाद किसी संत से चमत्कार दिखाने का आग्रह नहीं करूंगा।”
तुलसीदास जी ने मन ही मन हनुमान जी से प्रार्थना की। उसी क्षण वे सभी वानर अदृश्य हो गए। वातावरण शांत हो गया, मानो कुछ हुआ ही न हो।
अंततः अकबर ने तुलसीदास जी को कारागार से मुक्त कर आदर सहित विदा किया। यह प्रसंग केवल चमत्कार की कथा नहीं, बल्कि संत की विनम्रता और ईश्वर-भक्ति की महिमा का प्रतीक है, जहाँ अहंकार झुकता है और भक्ति विजयी होती है।
गोस्वामी तुलसीदास को बचाने वाले बंदर कौन थे?
लोक-परंपरा में वर्णित यह प्रसंग त्रेतायुग से जुड़ा हुआ है। जब रावण का वध हुआ और विभीषण को लंका का राज्य प्राप्त हुआ, तब समस्त वानर-सेना ने प्रभु श्री राम के समक्ष एक विलक्षण निवेदन किया।
वानरों ने विनोदपूर्ण भाव से कहा, “प्रभु! हमारा स्वभाव तो उपद्रव करने का है। युद्ध के समय हम नियमों और मर्यादाओं से बंधे रहे, इसलिए अपनी प्रकृति के अनुसार कुछ कर न सके। अब हमें लंका में थोड़ा उपद्रव करने की अनुमति दीजिए।”
भगवान श्रीराम ने उनकी बाल-सुलभ जिज्ञासा और उत्साह को देखकर अनुमति प्रदान कर दी। तत्पश्चात अधिकांश वानर हनुमान जी के साथ लंका में उत्पात करने चले गए।
परंतु कुछ देर पहले ही कुछ हजार वानर समस्त सेना के लिए वन से कंद-मूल और फल लाने चले गए थे। जब वे लौटकर आए, तब तक अन्य वानर अपना “उत्सव” पूर्ण कर चुके थे और लौट भी आए थे।
अब वे वानर भी उपद्रव की अनुमति पाने को उत्सुक थे। उन्होंने प्रभु श्रीराम से प्रार्थना की, किंतु इस बार भगवान ने मुस्कुराते हुए मना कर दिया। यह सुनकर वे अत्यंत निराश और उदास हो गए।
तब हनुमान जी ने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा, “तुम निराश मत हो। तुम सब सदा के लिए सुरक्षित (रिज़र्व) रहोगे। भविष्य में जब भी धर्म की रक्षा के लिए, या किसी विशेष कारण से उत्पात की आवश्यकता होगी, तब तुम्हें ही बुलाया जाएगा।”
किंवदंती के अनुसार, वही त्रेतायुग के बलशाली और भीमकाय वानर कालांतर में प्रकट हुए। जब मुगल सम्राट अकबर ने गोस्वामी तुलसीदास को बंदी बनाया, तब हनुमान जी ने उन्हीं “रिज़र्व” वानरों को प्रकट किया।
उन वानरों ने दिल्ली के लाल किला में ऐसा कोलाहल मचाया कि समस्त सैनिक व्याकुल हो उठे। किला अस्त-व्यस्त हो गया और सम्राट को अंततः संत की महिमा स्वीकार करनी पड़ी।
यह कथा केवल अद्भुत घटना का वर्णन नहीं करती, बल्कि यह संकेत देती है कि जब-जब सच्चे भक्त पर संकट आता है, तब-तब दैवीय शक्तियाँ उसकी रक्षा के लिए किसी न किसी रूप में प्रकट होती हैं।
