(Aarti Param Samb Shankar Ki Aarti) आरति परम साम्ब-शंकर की आरती भगवान शिव के निर्गुण और सगुण, दोनों दिव्य स्वरूपों का अत्यंत गूढ़ और भावपूर्ण वर्णन करती है। इस आरती में भगवान शिव को अनादि, अनंत, अविनाशी, ब्रह्मांड के कर्ता-भर्ता-संहारकर्ता तथा समस्त प्राणियों के अंतर्यामी के रूप में स्तुति की गई है। साथ ही उनके सौम्य एवं रौद्र दोनों रूपों (गंगाधर, चंद्रशेखर, पंचमुख, श्मशानवासी और नीलकंठ) का सुंदर वर्णन मिलता है। श्रद्धापूर्वक परम सांब-शंकर की आरती का गायन करने से दैन्य, दुःख और पापों का नाश होता है तथा भगवान शिव की कृपा से मन में शांति, भक्ति और आध्यात्मिक आनंद की प्राप्ति होती है।
आरति परम साम्ब-शंकर की | Aarti Param Samb Shankar ki
आरति परम साम्ब-शंकर की।
सत्य सनातन शिव शुभकर की॥
आदि, अनादि, अनन्त, अनामय।
अज, अविनाशी, अकल, कलामय।
सर्वरहित नित सर्व-उरालय।
मस्तक सुरसरिधर शशिधर की।
आरति परम साम्ब-शंकर की॥
कर्ता, भर्ता, जगसंहारी।
ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र तनुधारी।
सर्वविकाररूप अविकारी।
अग-जग-पालक प्रलयंकर की।
आरति परम साम्ब-शंकर की॥
विश्वातीत विश्वगत स्वामी।
द्रष्टा साक्षी अन्तर्यामी।
काम-काल सब-जग-हित कामी।
अनघ-स्वरूप सकल अघहर की।
आरति परम साम्ब-शंकर की॥
मुनि-मन-हरण मधुर शुचि सुंदर।
अति कमनीय रूप सुषमावर।
दिव्याम्बर रत्नाभूषणधर।
सर्व-नयन-मन-हर सुखकर की।
आरति परम साम्ब-शंकर की॥
विकट कराल पंचमुखधारी।
मुण्डमाल विषधर भयकारी।
हाथ कपाल श्मशान-बिहारी।
वेष अमंगल मंगलकर की।
आरति परम साम्ब-शंकर की॥
भोगी, योगी, ध्यानी, ज्ञानी।
जग-अभिमानाधार अमानी।
आशुतोष अति औढरदानी।
दैन्य-दुरित-दुर्गतिहर हर की।
आरति परम साम्ब-शंकर की॥
